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Tuesday, June 26, 2007

इंशा जी बहुत दिन बीत चुके - १

इंशा जी बहुत दिन बीत चुके
तुम तन्हा थे तुम तन्हा हो
ये जोग-बिजोग तो ठीक नहीं
ये रोग किसी का अच्छा हो?

कभी पूरब में, कभी पच्छिम में
तुम पुरवा हो, तुम पछुआ हो?
जो नगरी नगरी भटकाए
ऐसा भी न मन में काँटा हो

क्या और सभी चोंचला यहाँ
क्या एक तुम्हीं यहाँ दुखिया हो
क्या एक तुम्हीं पर धूप कड़ी
जब सब पर सुख का साया हो

तुम किस जंगल का फूल मियाँ
तुम किस बगिया की बेला हो
तुम किस सागर की लहर भला
तुम किस बादल की बरखा हो

तुम किस पूनम का उजियारा
किस अन्धी रैन की ऊषा हो
तुम किन हाथों की मेंहदी हो
तुम किस माथे का टीका हो

क्यों शहर तजा क्यों जोग लिया
क्यों वहशी हो क्यों रुस्वा हो
हम जब देखें बहरूप नया
हम क्या जानें तुम क्या-क्या हो

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