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Thursday, October 25, 2007

और तब राधा ने कहा...

सुनो मेरे मित्र!
यह जो मुझमें इसे, उसे, तुम्हें, अपने को-
कभी-कभी न समझ पाने की नादानी है न
इसे मत रोको
होने दो-
वह भी एक दिन हो-हो कर
रीत जायेगी...
-कनुप्रिया (धर्मवीर भारती)

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