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Tuesday, June 26, 2007

इंशा जी बहुत दिन बीत चुके - ५

इक आलम था क्या आलम था
वो सच्चा हो या झूठा हो

हम अपने आप में डूब गए
ख़ुद पत्थर बन ख़ुद दरिया हो
ज्यों घास का तिनका जंगल में
ज्यों आँधी में कोई पत्ता हो

हम किस से कहें, किस तौर कहें
कोई बात हमारी समझा हो!
हम उस से मिलें जो अपना हो
हम उस से कहें जो हम-सा हो

जब यह भी नहीं, जब वह भी नहीं
क्या बात बने, क्या रस्ता हो
इस ज़िन्दाँ में कोई रौज़न हो
इस गुम्बद में दरवाज़ा हो

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