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Tuesday, June 26, 2007

इंशा जी बहुत दिन बीत चुके - ४

हम नगरी-नगरी घूमे तो
जब निकले थे आवारा हो
वह लंदन हो वह पेरिस हो
वह बर्लिन हो वह रूमा हो

वह काबुल हो वह बाबुल हो
वह जावा हो वह लंका हो
वह साहिल सैन-ओ-राइन हो
या साहत-ए-नील-ओ-दजला हो

वह चीन का देस विशाल कहीं
या पच्छुम देस अमरीका हो
वह चोटी फ़यूजी यामा की
या आल्प्स का परबत ऊँचा हो

वह छतें गुलाबी लीडन की
या नीला आब जिनेवा हो
दिन इस्तांबुल की गलियों में
या शब की सैर-ए-प्राहा हो

कुछ सूरतें थीं कुछ मूरतें थीं
कुछ और भी शायद देखा हो
जहाँ नज़रें ठहरी-ठिठकी हों
जहाँ दिल का काँटा अटका हो

पर हमको तो कुछ याद नहीं
कुछ खोया हो कुछ पाया हो
इन बातों में इन घातों में
संजोग का कोई लम्हा हो

हम अपने जो ख़ुद आप नहीं
फिर बोलो कौन हमारा हो?

यूँ समझो शहर-सराय में
शब-भर के लिए कोई उतरा हो
कोई परदेसी कोई सैलानी
वो जिसका दूर ठिकाना हो

शाम आए सवेरे कूच किया
जब धुँधला-धुँधला रस्ता हो
जब धरती सूनी-सूनी हो
जब अम्बर फीका-फीका हो

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