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Tuesday, June 26, 2007

इंशा जी बहुत दिन बीत चुके - ३

क्यों ऐसे सपने देखते हो
इंशा जी तुम आप भी सपना हो
इक बीती लिखते शायर हो
इक गीत उगलती बीना हो

ये बातें मन में वह सोचे
जो क्या बतलाएँ कैसा हो?
वह जिसके हाथ में क़िस्मत की
इक लम्बी गहरी रेखा हो

वह शख़्स पुराने क़िस्सों का
इक मदमाता शह्ज़ादा हो
जो शहर का रस्ता भूला हो
और जंगल में आ निकला हो

वह राजा काशी नगरी का
या वाली-ए-बल्ख़-ओ-बुख़ारा हो
कुछ उसके ताज पे कलग़ी हो
कुछ उसका चाँद-सा चेहरा हो

वह मालिक महल-अटरियों का
या रूपे-सोनेवाला हो
या कोई अनोखा गुनवाला
वह जिसका जग में चर्चा हो

या कोई सजीला बंजारा
जो नगरी-नगरी घूमा हो

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