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Monday, December 10, 2007

...उपरान्त वार्ता

हिल उठा अचानक संयम का वट-वृक्ष
अस्फुट शब्दों की हवा तुम्हारे अधरों से क्या बही
सब जड़ें उभर आयीं...

पहले भी मैंने
तुमको समझाया था
याद करो-
ये बिरवा है
ढह जायेगा
लहरों के आगे इस बिरवे की क्या बिसात!

आँधियाँ संभाले हुए दिशाओं-सा दिल
रहे अविचलित
मुस्कानों को झेले जाये नित
इस योग्य नहीं।

जीवन का पहरेदार सजग: संयम,
लेकिन कब तक...?
हर क्षण पर कोई मुहर नहीं होती!

यह जीवन खाली था
इसको भरने वाली
आकांक्षाएँ पनिहारिन चढ़ आयीं
मैं कैसे समझाता या उन्हें मना करता!

पर तुमको तो
पहले भी समझाया था याद करो

मैं बहुत विवश हूँ
कोई लक्ष्मण-रेखा नहीं यहाँ
दूरी रखने के लिए कहाँ जाऊँ
तुम हो न जहाँ?

-दुष्यंत कुमार

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