ये बातें झूठी बातें हैं...

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Thursday, April 24, 2014

जग रही है रात साथी - १

जग रही है रात साथी...
सो न, कर कुछ बात साथी*!

प्रीत मेरी भार होगी
या तुम्हें स्वीकार होगी
है विदा अगले पहर या
जन्म भर का साथ, साथी?

प्रेम मद में चूर दोनों
जग से किंचित दूर दोनों
चल पड़े, पर ध्यान रखना
अब न छूटे हाथ, साथी!

समय हम को छल न जाए
मन का मौसम ढल न जाए
सींचना यह नेह उपवन
झर न जाएँ पात, साथी

चाह को विस्तार देना
तुम मुझे आधार देना
हो जगत भी सामने तो
हो न अपनी मात, साथी

जग रही है रात साथी
सो न, कर कुछ बात साथी!


* प्रेरणास्रोत: 'साथी, सो न, कर कुछ बात' / हरिवंशराय बच्चन

Desires Desires All Along


Rainy evenings, starry nights
Bright sky, full of kites
'N there might even be love,
Poetry, and a sweet song

All Along...

हजारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले...