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Monday, September 22, 2014

फ़िक्र लाज़िम सही...

अब के रोए नहीं जुदा होके
दिल को भटका दिया ख़फ़ा होके

वो जो होनी थी ज़िंदगी अपनी
दिल में क़ायम है तमन्ना होके

वो जो होनी थी हक़ीक़त यारों
छप गई एक फ़लसफ़ा होके

वो जो होना था सायबां अपना
रह गया एक तजुर्बा होके

उम्र लगती है पहुँचने में वहाँ
लौट आए हैं हम जहाँ होके

बंदगी का सबर नहीं बाक़ी
हमको रहना है अब ख़ुदा होके

फ़िक्र लाज़िम सही मग़र 'नाज़ुक'
वो भी उड़ जाएगी धुँआ होके

फ़लसफ़ा: philosophy
सायबां: abode
तजुर्बा: experiment
बंदगी: devotion
सबर: patience
लाज़िम: necessary

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