ये बातें झूठी बातें हैं...

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Sunday, June 07, 2015

कोई शिक़वा ना गिला...

कोई शिक़वा ना गिला था पहले
सब भला लगा, भला था पहले

राह कुछ ऐसे मोड़ भी लेगी
हमको इमकां1 हुआ था पहले

कुछ तजुर्बा तो हमें भी है मियाँ
कोई ऐसे ठगा  था पहले

रोशनी के भरम में मारे गए
चाँद पत्थर लगा था पहले

लुत्फ़ बेबाक ठहाकों में नहीं
वो जो रोने में मज़ा था पहले

बस्तियाँ सलवटों की अब हैं जहाँ
तेरे होठों का पता था पहले

ये सफ़र इस जनम अधूरा रहा
वरना मंज़िल का गुमां2 था पहले

ना-उम्मीदी तो बहुत बाद आई
दिल तमन्ना से मिला था पहले

अब करम पर यक़ीं ना रहमत पर
वरना अपना भी ख़ुदा था पहले

ये ज़हर कौन भर गया 'नाज़ुक'
यहाँ अमरित का कुआं था पहले


1. आभास, premonition
2. संभाव्यता, surmise

Sunday, September 28, 2014

उदास तुम

फिर उदास हो तुम !

सुना है मैंने
उन से
जो जानते हैं तुम्हें
मुझको भी
बता रहे थे
कुछ उदास हो तुम

{}

रंग उतरा हुआ-सा  रहता है
हमेशा
चुप चहकती है, ज़्यादातर
पुरानी शॉल जैसे ओढ़ ली हो
(प्यारी, मगर बहुत पुरानी)

दर्द  की कई परतें
चेहरे पर रहती हैं
बारीक़ सजी हुई

उम्र भी छोड़ने लगा है अब
सिलवटों में अपने तोहफ़े

तोहफ़े पसन्द नहीं ना तुमको
शायद इसीलिए
अब उदास हो तुम

{}

कुछ तो तन्हाई भी मुजरिम है
मग़र जज्ब का हुनर भी है तुमको
एक क़तरा रोशनाई भी
देख ले कोई
मुमकिन है !

कुछ जो तुमने लिखा भी होगा
सिर्फ और सिर्फ दिल के सफहों पर
(अब तक तो ग्रंथ छप चुके होंगे)

कोई पढ़ ले तो जान ही जाए
बात ऐसी भी क्या है आखिर
आखिर किसलिए
यूँ उदास हो तुम

{}

कुछ तो इमकान सब को  होता है
जज्ब की तासीर भाँप जाते हैं
बात निकले दूर तक पहुंचे
लोग चुप्पी से ताड़ जाते हैं

सलवटें, दर्द की बारीक़ परतें
इनसे होकर भी कथा आती है
ग़म किसी एक की तो मिल्कियत नहीं
हर कहानी में वही एक व्यथा आती है

सोचो तो 
मैं भी औरों की तरह सोचता हूँ
मानो जानता हूँ
कि क्यूँ उदास हो तुम

{}

चाँद छूने को बढ़े हाथ कभी
धूल कींचड़ में नहीं सनते हैं
थोड़ा मौसम का असर होगा वहाँ
दिन बिगड़ते हैं, खुद ही बनते हैं

कोई दिन यूँ ही काट लो हमदम
सर्द रातें भी बीत जाएँगी
ये उदासी हमेशा को नहीं
ख़ुशनुमा चाँदनी भी आएगी

देखो ना
मैं भी औरों की तरह हो गया हूँ
मान बैठा हूँ
कि उदास हो तुम

{}

और होने को ये भी मुमकिन है
कोई दुःख-दर्द-ज़दा मिल गया हो
राह में कुछ देख कर दिल बैठा हो
बॉस की झिड़की टाली जा रही हो
या कोई सपना बुरा-सा गया हो

या कोई अच्छी सी नॉवेल पढ़ने के बाद
उस से बाहर ना आना भा गया हो

कुछ भी मुमकिन है मगर शायद
बात झूठी है कि उदास हो तुम

{}

मेरा नम्बर तो अभी भी है वही
तुमको मालूम भी है, याद भी है
साल-दो-साल में कभी यूँ ही
याद कर लेना अगर याद आए

और कुछ हो हो मगर हमदम
इतना तो इल्म हो ही जाएगा
ज़िन्दगी कैसी कट रही है अब !
कौन सी नॉवेल है पढ़ने के लायक़ !!
अगली इतवार का प्रोग्राम क्या है !!!

और यह सब ना भी हो
तो भी क्या
पूछ तो सकते ही हैं हम
एक दूसरे से
क्या उदास हो तुम?
क्यूँ उदास हो तुम?

Monday, September 22, 2014

फ़िक्र लाज़िम सही...

अब के रोए नहीं जुदा होके
दिल को भटका दिया ख़फ़ा होके

वो जो होनी थी ज़िंदगी अपनी
दिल में क़ायम है तमन्ना होके

वो जो होनी थी हक़ीक़त यारों
छप गई एक फ़लसफ़ा होके

वो जो होना था सायबां अपना
रह गया एक तजुर्बा होके

उम्र लगती है पहुँचने में वहाँ
लौट आए हैं हम जहाँ होके

बंदगी का सबर नहीं बाक़ी
हमको रहना है अब ख़ुदा होके

फ़िक्र लाज़िम सही मग़र 'नाज़ुक'
वो भी उड़ जाएगी धुँआ होके

फ़लसफ़ा: philosophy
सायबां: abode
तजुर्बा: experiment
बंदगी: devotion
सबर: patience
लाज़िम: necessary

Thursday, April 24, 2014

जग रही है रात साथी - १

जग रही है रात साथी...
सो न, कर कुछ बात साथी*!

प्रीत मेरी भार होगी
या तुम्हें स्वीकार होगी
है विदा अगले पहर या
जन्म भर का साथ, साथी?

प्रेम मद में चूर दोनों
जग से किंचित दूर दोनों
चल पड़े, पर ध्यान रखना
अब न छूटे हाथ, साथी!

समय हम को छल न जाए
मन का मौसम ढल न जाए
सींचना यह नेह उपवन
झर न जाएँ पात, साथी

चाह को विस्तार देना
तुम मुझे आधार देना
हो जगत भी सामने तो
हो न अपनी मात, साथी

जग रही है रात साथी
सो न, कर कुछ बात साथी!


* प्रेरणास्रोत: 'साथी, सो न, कर कुछ बात' / हरिवंशराय बच्चन

Desires Desires All Along


Rainy evenings, starry nights
Bright sky, full of kites
'N there might even be love,
Poetry, and a sweet song

All Along...

हजारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले...

Wednesday, December 03, 2008

आज एक और बरस...

The new has arrived already
And the old hasn't yet departed
Survived by memories, passions linger
Conscience crippled by the wisdom imparted.

The flame of desires burning aglow
Rejuvenated in the changing seasons
Things fall apart 'n fall back in place again
The heart indeed has its own reasons

(~January 2008)

Friday, December 28, 2007

Escape

अपना चेहरा ना बदला गया
आइने से ख़फ़ा हो गए...
-निदा फ़ाज़ली

Wednesday, December 26, 2007

प्रिय २००७

तुम चले जाओगे तो सोचेंगे
हमने क्या खोया हमने क्या पाया