My Photo
Name:
Location: Bangalore, Karnataka, India

Saturday, September 29, 2007

चित्रलेखा: पाप

ये पाप है क्या, ये पुण्य है क्या
रीतों पर धर्म की मुहरें हैं...
-चित्रलेखा (शैलेन्द्र)

संसार में पाप कुछ भी नहीं है, वह केवल मनुष्य के दृष्टिकोण की विषमता का दूसरा नाम है। प्रत्येक व्यक्ति एक विशेष प्रकार की मन:प्रवृत्ति लेकर उत्पन्न होता है - प्रत्येक व्यक्ति इस संसार के रंगमंच पर एक अभिनय करने आता है। अपनी मन:प्रवृत्ति से प्रेरित होकर अपने पाठ को वह दुहराता है - यही मनुष्य का जीवन है। जो कुछ मनुष्य करता है, वह उसके स्वभाव के अनुकूल होता है और स्वभाव प्राकृतिक है। मनुष्य अपना स्वामी नहीं है, वह परिस्थितियों का दास है - विवश है। कर्त्ता नहीं है, वह केवल साधन है। फिर पुण्य और पाप कैसा... संसार में इसीलिए पाप की परिभाषा नहीं हो सकी - और न हो सकती है। हम न पाप करते हैं और न पुण्य करते हैं, हम केवल वह करते हैं जो हमें करना पड़ता है।
-चित्रलेखा (भगवती चरण वर्मा)

0 Comments:

Post a Comment

<< Home