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Saturday, September 29, 2007

चित्रलेखा: विराग

कूचे को तेरे छोड़कर, जोगी ही बन जाएँ मग़र
जंगल तेरे, परबत तेरे, बस्ती तेरी, सहरा तेरा
-इब्ने इंशा

"आर्य! रत और विरत, अनुरागी और विरागी तथा गृहस्थ और संन्यासी में भेद बहुत थोड़ा है और जो कुछ है भी वह नहीं के बराबर है... मनुष्य कभी वास्तव में विरागी नहीं हो सकता। विराग मृत्यु का द्योतक है। जिसको साधारण रूप में विराग कहा जाता है, वह केवल अनुराग के केंद्र को बदलने का दूसरा नाम है। अनुराग चाह है, विराग तृप्ति है।"
-चित्रलेखा (भगवती चरण वर्मा)

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